अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी ॥
मधुसूदन दामोदर सुआमी ॥
रिखीकेस गोवरधन धारी मुरली मनोहर हरि रंगा ॥१॥
मोहन माधव क्रिस्न मुरारे ॥
जगदीसुर हरि जीउ असुर संघारे ॥
जगजीवन अबिनासी ठाकुर घट घट वासी है संगा ॥२॥
धरणीधर ईस नरसिंघ नाराइण ॥
दाड़ा अग्रे प्रिथमि धराइण ॥
बावन रूपु कीआ तुधु करते सभ ही सेती है चंगा ॥३॥
स्री रामचंद जिसु रूपु न रेखिआ ॥
बनवाली चक्रपाणि दरसि अनूपिआ ॥
सहस नेत्र मूरति है सहसा इकु दाता सभ है मंगा ॥४॥
भगति वछलु अनाथह नाथे ॥
गोपी नाथु सगल है साथे ॥
बासुदेव निरंजन दाते बरनि न साकउ गुण अंगा ॥५॥
मुकंद मनोहर लखमी नाराइण ॥
द्रोपती लजा निवारि उधारण ॥
कमलाकंत करहि कंतूहल अनद बिनोदी निहसंगा ॥६॥
अमोघ दरसन आजूनी स्मभउ ॥
अकाल मूरति जिसु कदे नाही खउ ॥
अबिनासी अबिगत अगोचर सभु किछु तुझ ही है लगा ॥७॥
स्रीरंग बैकुंठ के वासी ॥
मछु कछु कूरमु आगिआ अउतरासी ॥
केसव चलत करहि निराले कीता लोड़हि सो होइगा ॥८॥
निराहारी निरवैरु समाइआ ॥
धारि खेलु चतुरभुजु कहाइआ ॥
सावल सुंदर रूप बणावहि बेणु सुनत सभ मोहैगा ॥९॥
बनमाला बिभूखन कमल नैन ॥
सुंदर कुंडल मुकट बैन ॥
संख चक्र गदा है धारी महा सारथी सतसंगा ॥१०॥
पीत पीत्मबर त्रिभवण धणी ॥
जगंनाथु गोपालु मुखि भणी ॥
सारिंगधर भगवान बीठुला मै गणत न आवै सरबंगा ॥११॥
निहकंटकु निहकेवलु कहीऐ ॥
धनंजै जलि थलि है महीऐ ॥
मिरत लोक पइआल समीपत असथिर थानु जिसु है अभगा ॥१२॥
पतित पावन दुख भै भंजनु ॥
अहंकार निवारणु है भव खंडनु ॥
भगती तोखित दीन क्रिपाला गुणे न कित ही है भिगा ॥१३॥
निरंकारु अछल अडोलो ॥
जोति सरूपी सभु जगु मउलो ॥
सो मिलै जिसु आपि मिलाए आपहु कोइ न पावैगा ॥१४॥
आपे गोपी आपे काना ॥
आपे गऊ चरावै बाना ॥
आपि उपावहि आपि खपावहि तुधु लेपु नही इकु तिलु रंगा ॥१५॥
एक जीह गुण कवन बखानै ॥
सहस फनी सेख अंतु न जानै ॥
नवतन नाम जपै दिनु राती इकु गुणु नाही प्रभ कहि संगा ॥१६॥
ओट गही जगत पित सरणाइआ ॥
भै भइआनक जमदूत दुतर है माइआ ॥
होहु क्रिपाल इछा करि राखहु साध संतन कै संगि संगा ॥१७॥
द्रिसटिमान है सगल मिथेना ॥
इकु मागउ दानु गोबिद संत रेना ॥
मसतकि लाइ परम पदु पावउ जिसु प्रापति सो पावैगा ॥१८॥
जिन कउ क्रिपा करी सुखदाते ॥
तिन साधू चरण लै रिदै पराते ॥
सगल नाम निधानु तिन पाइआ अनहद सबद मनि वाजंगा ॥१९॥
किरतम नाम कथे तेरे जिहबा ॥
सति नामु तेरा परा पूरबला ॥
कहु नानक भगत पए सरणाई देहु दरसु मनि रंगु लगा ॥२०॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि ॥
तू आपे कथहि तै आपि वखाणहि ॥
नानक दासु दासन को करीअहु हरि भावै दासा राखु संगा ॥21॥2॥11॥1082॥

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