अग्निरेखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Agnirekha Part 1

अग्निरेखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Agnirekha Part 1

अग्नि-स्तवन

पर्व ज्वाला का, नहीं वरदान की वेला !
न चन्दन फूल की वेला !

चमत्कृत हो न चमकीला
किसी का रूप निरखेगा,
निठुर होकर उसे अंगार पर
सौ बार परखेगा
खरे की खोज है इसको, नहीं यह क्षार से खेला !

किरण ने तिमिर से माँगा
उतरने का सहारा कब ? अकेले दीप ने जलते समय
किसको पुकारा कब ?
किसी भी अग्निपंथी को न भाता शब्द का मेला !

किसी लौ का कभी सन्देश
या आहूवान आता है ?
शलभ को दूर रहना ज्योति से
पल-भर न भाता है !
चुनौती का करेगा क्या, न जिसने ताप को झेला !

खरे इस तत्व से लौ का
कभी टूटा नहीं नाता
अबोला, मौन भाषाहीन
जलकर एक हो जाता !
मिलन-बिछुड़न कहाँ इसमें, न यह प्रतिदान की वेला !

सभी का देवता है एक
जिसके भक्त हैं अनगिन,
मगर इस अग्नि-प्रतिमा में
सभी अंगार जाते बन !
इसी में हर उपासक को मिला अद्वैत अलबेला !

न यह वरदान की वेला
न चन्दन फूल का मेला !
पर्व ज्वाला का, न यह वरदान की वेला।

किस तरंग ने इसे छू लिया

किस तरंग ने इसे छू लिया
मन अब लहरों-सा बहता है !

पाल उड़ा डाले पक्षी-से,
नभ की ओर खोलकर इसने,
फिर फेंकी पतवार अतल में
तरणी आज डुबा दी इसने ।
अब न किसी तट पर रुकने का
यह कोई बंधन सहता है !
लहरों में ही मन बहता है !

लहरें बहतीं किस सागर में
सागर मिल जाता है किसमें,
ज्ञात नहीं किस तट से आया
अब यह ठहरेगा किस तट में,
देश ज्ञात ही नहीं ध्यान
इसको न कभी दिशि का रहता है !
मन अब लहरों-सा बहता है !

पहुँचेगा यह वहीं जहाँ
इसको प्रवाह यह पहुंचाएगा !
लक्ष्य वही इसका होगा
जिसको यह सागर बतलाएगा !
पाल, तरी, पतवारें, भूला
अपने को सागर कहता है !
लहरों-सा ही मन बहता है !

दीपक अब रजनी जाती रे-गीत

दीपक अब रजनी जाती रे

जिनके पाषाणी शापों के
तूने जल जल बंध गलाए
रंगों की मूठें तारों के
खील वारती आज दिशाएँ
तेरी खोई साँस विभा बन
भू से नभ तक लहराती रे
दीपक अब रजनी जाती रे

लौ की कोमल दीप्त अनी से
तम की एक अरूप शिला पर
तू ने दिन के रूप गढ़े शत
ज्वाला की रेखा अंकित कर
अपनी कृति में आज
अमरता पाने की बेला आती रे
दीपक अब रजनी जाती रे

धरती ने हर कण सौंपा
उच्छवास शून्य विस्तार गगन में
न्यास रहे आकार धरोहर
स्पंदन की सौंपी जीवन रे
अंगारों के तीर्थ स्वर्ण कर
लौटा दे सबकी थाती रे
दीपक अब रजनी जाती रे

हिमालय

इंद्रधनुष पर बाण चढ़ा विद्युत् फूलों के
कामदेव-सा घिर-घिरकर आता है बादल,
नहीं वेध पाता पाषाणी कवच तुम्हारा
नहीं खुला पाता आग्नेई नयन अचंचल,
समाधिस्थ तुम रहे सदा ही मौन हिमालय !

शुभ्र हिमानी प्रज्ञा का रस जटाजूट शिर
बैठे हो युग-युग से किसके ध्यानमग्न-मन
रोम-रोम से तुम पाषाणी कवच हो गए
वज्र हो गया पुष्प घाटियोंवाला मृदुतन
यह अबूझ तप है किसके हित मौन हिमालय?

दावानल लेकर आँधी के झोंके आते
छूकर तुमको मलय समीरण वन-वन जाते,
कभी अग्निमय कभी चन्दनी किरणें लेकर
रवि-शशि आते किंतू हार पग पर रख जाते,
नहीं अर्चना-पूजा की भी साध हिमालय !

ताप-दग्ध रविकर से होकर व्याकुल जिस दिन
धरती करती शब्दहीन-सा प्यासा क्रन्दन,
शत-शत कवच अभेद्य भेदकर सहस्रार तक
पहुंची है नीरव पुकार भी तुम तक उस क्षण,
कैसा है यह कवच शिला का मौन हिमालय !

ध्यान भंग टूटी समाधि खुल जाती पलकें
दुख की करुण पुकार बना जाती आकुल मन,
नहीं नयन में किन्तु जलानेवाली ज्वाला
झलका एक बूंद जल ही का तरल अश्रुकण !
करुणा की गंगा होती क्या स्रवित हिमालय !

शिव के जटाजूट की प्रति लट में विचरण कर
इसने कर दी शांत तीसरे दृग की ज्वाला
ताण्डवरत पग थाम लिया है इसने झुककर
रुद्र-चरण को पहना दी लहरों की माला !
द्रवित हृदय की वन्या है यह मौन हिमालय !

सिंह-वृषभ औ’ अहि-मयूर का द्वेष शमन कर
संधिपत्र लहरों में लिखवा एक किया है
नहीं भस्म से नहीं गरल से विषपायी का
एक बूंद आँसू से ही अभिषेक किया है !
कर नूतन सर्जना रहे हो मौन हिमालय !

अब धरती का रोम-रोम है विद्ध शरों से
शर-शैया पर व्याप्त गूँजता आकुल रोदन,
द्रवित न होंगे प्राण न हलचल से अस्थिर मन
करुणा की गंगा का होगा क्या न अवतरण ?
क्या यह नूतन जन्म तुम्हारा मौन हिमालय !

क्या मरु का विस्तार हो गया वह करुणा-कण
फूलों की मधुहंसी प्यास का क्षार हो गई,
यह किसका अभिशाप तुम्हें घेरे है गिरिवर?
वह नवनीत हिमानी अब पाषाण हो गई!
किन चरणों की राह देखते आज हिमालय ?

बीज से-कहाँ उग आया है तू हे बीज अकेला

कहाँ उग आया है तू हे बीज अकेला ?

यह वह धरती रही सभी को जो अपनाती,
नहीं किसी को गोद बिठाने में सकुचाती,
ऊँच-नीच का जिसमें कोई भेद नहीं है
इसमें आकर प्राण मुक्त प्राणों से खेला !

सघन छाँह वाले हों चाहे नीम-महावट,
अमृत फलवाले हों चाहे आम्र-आमलक,
इन विशाल तरुओं का संगी बना लिया है,
जिसने अंक बिठाकर अपने लघु दूर्वादल !
इस माटी में सदा सृजन का लगता मेला !

नीर-क्षीर से पाल इन्हें नव जीवन देती,
जो मुरझाते उन्हें स्नेह-आश्रय में लेती,
नहीं माधवी सुरभित या अंगूर लताएँ,
इसने तो काँटोंवाली झाड़ी को झेला !

स्नेह-तरल माटी में ही तो रहता जीवन
ये तो हैं पाषाण सभी सूखे नीरस मन ।
अब न प्रतीक्षा कर स्नेहिल धरती माता की,
अब मत कर मनुहार मेघ जीवनदाता की,
अपने ही पौरुष से है तू आज दुकेला !

पग नीचे पाषाण चौंपकर शिर ऊंचा कर,
झेल चुनौती रवि की, नभ की, आज न तू डर,
वे ही ऊँचे उठे बढ़े जो मौन अकेले,
उनसे ही यह काल सदा संगी-सा खेला !
कहाँ उग आया है तू हे बीज अकेला ?

वीणावादिनि ! कस लिया आज क्या अग्नि-तार (गीत)

वीणावादिनि ! कस लिया आज क्या अग्नि-तार ?
आंखों का पानी चढ़ा-चढ़ा कर अग्नि-तार !

रवि-शशि-तूम्बों में विकल रंगभीनी आँधी,
नक्षत्र-खूंटियों पर किरणें खींची बाँधी,
आघातों पर खुलते जीवन के रुद्ध द्वार !

चिनगारी – केसर लौ – मरंद, आभा – कुड्मल,
हैं झूम रहे स्वर-ग्रामों के चंचल अलि-दल,
तेरा लपटों का कमल खिला है सहस्रार ।

तेरे संकल्पों की प्रतिमा जो शुभ्र गात,
वह हंस हो गया विद्युत् का खग ज्वाल-स्नात !
पंखों को छू तम हुआ अर्चि का हरसिंगार !

झंकार-मूर्च्छना के कूलों पर ठहर ठहर,
भू-नभ छु लेती राग-सिन्धु की मुक्त लहर,
तालों पर उठता-गिरता है आलोक-ज्वार !

कण अज बह चले बन स्वप्नों के ज्वलित दीप,
क्षण ठहर गए बन कर गीतों के मुखर सीप,
नभ कहता मुझको आज धरा पर दो उतार !

वीणावादिनि ! कस लिया आज क्या अग्नि-तार !

 टकरायेगा नहीं

टकरायेगा नहीं आज उद्धत लहरों से,
कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?

अब तक धरती अचल रही पैरों के नीचे,
फूलों की दे ओट सुरभि के घेरे खींचे,
पर पहुँचेगा पथी दूसरे तट पर उस दिन
जब चरणों के नीचे सागर लहरायेगा !
कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?

गर्त शिखर वन, उठे लिए भंवरों का मेला,
हुए पिघल ज्योतिष्क तिमिर की निश्चल वेला,
तू मोती के द्वीप स्वप्न में रहा खोजता,
तब तो बहता समय शिला सा जम जायेगा ।
कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?

तेरी लौ से दीप्त देव-प्रतिमा की आँखें,
किरणें बनी पुजारी के हित वर की पांखें,
वज्र-शिला पर गढ़ी ध्वंस की रेखायें क्या
यह अंगारक हास नहीं पिघला पायेगा ?
कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?

धूल पोंछ कांटे मत गिन छाले मत सहला,
मत ठण्डे संकल्प आँसुयों से तू नहला,
तुझसे हो यदि अग्नि-स्नात यह प्रलय महोत्सव
तभी मरण का स्वस्ति-गान जीवन गायेगा ।
कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?

टकरायेगा नहीं आज उद्धत लहरों से
कौन ज्वार फिर तुझे दिवस तक पहुँचायेगा ?

 

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