अग्निरेखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Agnirekha Part 4

अग्निरेखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Agnirekha Part 4

 आँखों में अंजन-सा आँजो मत अंधकार-गीत

आँखों में अंजन-सा
आँजो मत अंधकार !

तिमिर में न साथ रही
अपनी परछाई भी,
सागर नभ एक हुए
पर्वत औ’ खाई भी,

मेघ की गुफाओं में बन्दी जो आज हुआ,
सूरज वह माँग रहा
तुमसे अब दिन उधार !

कुंडली में कसता जग
क्षितिज हुआ महाव्याल
शृंखला बनाता है
क्षण-क्षण को जोड़ काल,

रात ने प्रभंजन की आहट भी पी ली है,
दिशि-दिशि ने प्रहरों के
मूँद लिए वज्र-द्वार !

हीरक नहीं जो जड़े मुकुटों में जाते हैं,
मोती भी नहीं हैं
इन्हें वेध कौन पाते हैं ?
ज्वालामुखियों में पले सपने ये अग्नि-विहग

लपटों के पंखों पर
कर लेंगे तिमिर पार।
विश्व आज होगा
चिनगारियों का हरसिंगार !

बाँच ली मैंने व्यथा की बिन लिखी पाती नयन में-गीत

बाँच ली मैंने व्यथा की बिन लिखी पाती नयन में !

मिट गए पदचिह्न जिन पर हार छालों ने लिखी थी,
खो गए संकल्प जिन पर राख सपनों की बिछी थी,
आज जिस आलोक ने सबको मुखर चित्रित किया है,
जल उठा वह कौन-सा दीपक बिना बाती नयन में !

कौन पन्थी खो गया अपनी स्वयं परछाइयों में,
कौन डूबा है स्वयं कल्पित पराजय खाइयों में,
लोक जय-रथ की इसे तुम हार जीवन की न मानो
कौंध कर यह सुधि किसी की आज कह जाती नयन में।

सिन्धु जिस को माँगता है आज बड़वानल बनाने,
मेघ जिस को माँगता आलोक प्राणों में जलाने,
यह तिमिर का ज्वार भी जिसको डुबा पाता नहीं है,
रख गया है कौन जल में ज्वाल की थाती नयन में ?

अब नहीं दिन की प्रतीक्षा है, न माँगा है उजाला,
श्वास ही जब लिख रही चिनगारियों की वर्णमाला !
अश्रु की लघु बूँद में अवतार शतशत सूर्य के हैं,
आ दबे पैरों उषाएँ लौट अब जातीं नयन में !
आँच ली मैंने व्यथा की अनलिखी पाती नयन में !

सृजन के विधाता! कहो आज कैसे(गीत)

सृजन के विधाता! कहो आज कैसे
कुशल उंगलियों की प्रथा तोड़ दोगे ?
अमर शिल्प अपना बना तोड़ दोगे ?

युगों में गढ़े थे धवल-श्याम बादल,
न सपने कभी बिजलियों ने उगाए
युगों में रची सांझ लाली उषा की
न पर कल्पना-बिम्ब उनमें समाये
बनाए तभी तो नयन दो मनुज के
जहाँ कल्पना-स्वप्न ने प्राण पाए !
हँसी में खिली धूप में चाँदनी भी
दृगों में जले दीप में मेघ छाए !
मनुज की महाप्राणता तोड़कर तुम
अजर खंड इसके कहाँ जोड़ दोगे ?

बनाए गगन और ज्योतिष्क कितने,
बिना श्वास पाषाण ही की कथा है,
युगों में बनाए भरे सात सागर
तृषित के लिए घूंट भी चिर कथा है !
कुलिश-फूल दोनों मिलाकर तुम्हीं ने
गढ़ी नींद में थी कभी एक झांकी
सजग हो तराशा किए मूर्ति अपनी,
कठिन और कोमल सरल और बांकी !
लिए शिव चली जो अथक प्राण गंगा,
इसे किस मरण सिंधु में मोड़ दोगे ?

बने हैं भले देव मंदिर अनेकों
सभी के लिए एक यह देवता है,
स्वयं तुम रहे हो सदा आवरण में
इसी में उजागर तुम्हारा पता है !
सदा अधबनी मूर्ति देती चुनौती,
इसी को कलशदीप्त मंदिर मिलेगा,
न ध्वनि शंख की है, न पूजन न वंदन,
गहन अंध तम में न दीपक जलेगा !
सृजन के विधाता इसी शून्य में क्या
मनुज देवता अधबना छोड़ दोगे ?

कुशल उंगलियों की प्रथा तोड़ दोगे ?
अमर शिल्प अपना बना तोड़ दोगे ?

दिया

धूलि के जिन लघु कणों में है न आभा प्राण,
तू हमारी ही तरह उनसे हुआ वपुमान!
आग कर देती जिसे पल में जलाकर क्षार,
है बनी उस तूल से वर्ती नई सुकुमार ।
तेल में भी है न आभा न कहीं आभास,
मिल गये सब तब दिया तूने असीम प्रकाश।
धूलि से निर्मित हुआ है यह शरीर ललाम,
और जीवन वर्ति भी प्रभु से मिली अभिराम ।
प्रेम का ही तेल भर जो हम बने नि:शोक,
तो नया फैले जगत के तिमिर में आलोक !

क्यों पाषाणी नगर बसाते हो जीवन में

क्यों पाषाणी नगर बसाते हो जीवन में ?

माना सरिता नहीं,
नहीं कोई निर्झरिणी,
तपते दिन की ज्वाला से
झुलसी है धरिणी,
नहीं ओस का कण भी क्या अब रहा गगन में?

नहीं मंजरित आम
नहीं कोकिल का गायन,
पल्लव – मर्मर नहीं
नाचते नहीं शिखी गण,
क्या न जगाते तुम्हें काक भी अपने स्वन में?

खिलते पाटल नहीं
न चंपक वन फूले हैं
इस पथ को तितलियाँ
भ्रमर के दल भूले हैं !
पर काँटों की चुभन नहीं है क्या इस वन में !

माना चंदन-वन से
जो सुरभित हो आता,
इस उपवन में पवन
नहीं आता लहराता !
पर आँधी भी आज पड़ गई क्या बंधन में ?

इस सन्नाटे से तो
हाहाकार भला है,
नहीं मरन वह तो
जीवन की ओर चला है !
माना सुख-युग नहीं वेदना-क्षण हो मन में ।
क्यों पाषाणी नगर बसाते हो जीवन में ?

नहीं हलाहल शेष, तरल ज्वाला से अब प्याला भरती हूँ

नहीं हलाहल शेष, तरल ज्वाला से अब प्याला भरती हूँ !

विष तो मैंने पिया, सभी को व्यापी नीलकण्ठता मेरी;
घेरे नीला ज्वार गगन को बांधे भू को छांह अंधेरी;
सपने जम कर आज हो गये चलती फिरती नील शिलाएं,
आज अमरता के पथ को मैं
जल कर उजियाला करती हूं !

हम से सीझा है यह दीपक आंसू से बाती है गीली;
दिन से धनु की आज पड़ी है क्षितिज-शिञ्जिनी उतरी ढीली,
तिमिर-कसौटी पर पैना कर चढ़ा रही मैं दृष्टि-अग्निशर,
आभाजल में फूट बहे जो
हर क्षण को छाला करती हूं ।

पग में सौ आवर्त्त बांधकर नाच रही घर-बाहर आंधी
सब कहते हैं यह न थमेगी, गति इसकी न रहेगी बांधी,
अंगारों को गूंथ बिजलियों में, पहना दूं इसको पायल,
दिशि दिशि को अर्गला
प्रभञ्जन ही को रखवाला करती हूं !

क्या कहते हो अंधकार ही देव बन गया इस मन्दिर का ?
स्वस्ति ! समर्पित इसे करूंगी आज अर्घ्य अंगारक-उर का !
पर यह निज को देख सके औ’ देखे मेरा उज्जवल अर्चन,
इन सांसों को आज जला मैं
लपटों की माला करती हूं !

नहीं हलाहल शेष, तरल ज्वाला से मैं प्याला भरती हूँ !

चातकी हूँ मैं

चातकी हूँ मैं किसी करुणा-भरे घन की !

खो रहे जिसके तमस में
ज्योति के खग ज्वाल के शर,
पीर की दीपित धुरी पर
घूमते वे सात अम्बर;
सात सागर पूछते हैं
साध लघु मन की!
चातकी हूँ मैं किसी करुणा-भरे घन की !

जब खुली पांखें दिवस ने
पाल लपटों के लपेटे,
जब मुँदी आँखें गगन के
स्वप्न भू से, उतर भेंटे;
अश्रु से मुक्तावती है
सीप रजकण की!
चातकी हूँ मैं किसी करुणा-भरे घन की !

बज रहे हैं रंध्र मन के
एक करुण पुकार से भर,
दूब-अक्षर में उभर आये
व्यथा के मौन के स्वर;
प्यास मेरी लौटती
बन छाँह सावन की।
चातकी हूँ मैं अजर करुणा-भरे घन की !

राह थी अँधेरी पर गीत संग-संग चला

राह थी अँधेरी पर गीत संग-संग चला

उठकर आरोह ने बवंडर को साध लिया,
उतरे अवरोह ने तरंगों को बांध लिया,
स्वर्ण जूही फूल उठी
जहाँ दीपराग जला
राह थी अँधेरी पर गीत संग-संग चला

नापा आलापों ने मूर्च्छना ने तोल लिया,
शूल में समाकर हर पग को अनमोल किया,
लय ने अगारों पर
चन्दनी पराग मला
राह थी अँधेरी पर गीत संग-संग चला

पात गुनगुनाता अब सागर दुहराता है,
बादल अनुवादक, नभ रंगों में गाता है,
सीख कौन पाया
अब तक यह छन्द-कला
राह थी अँधेरी पर गीत संग-संग चला

स्वर के शत बिम्बों ने एक पल अनंत किया,
सातों आकाशों के शून्य को वसन्त दिया,
मृत्यु ने इसे न छुआ
काल ने इसे न छला
गीत संग-संग चला

Leave a Reply