अग्निरेखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Agnirekha Part 3

अग्निरेखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Agnirekha Part 3

 वंशी में क्या अब पाञ्चजन्य गाता है-गीत

वंशी में क्या अब पाञ्चजन्य गाता है ?

शत शेष-फणों की चल मणियों से अनगिन,
जल-जल उठते हैं रजनी के पद-अंकन,
केंचुल-सा तम-आवरण उतर जाता है !

छू अनगढ़ समय-शिला को ये दीपित स्वर,
गढ़ छील, कणों को बिखराते धरती पर,
आकार एक ही, पर निखरा आता है।

लय ने छू-छूकर यह छायातन सपने,
कर दिये जगा, जाने-पहचाने अपने,
चिर सत्य पलक-छाया में मँडराता है।

मेघों में डूबा सिन्ध किरण में आँधी,
एक ही पुलिन ने जीवन-सरिता बाँधी,
अब आर-पार-तरिणी से क्या नाता है ?

शत-शत वसन्त पतझर में बोले हौले,
तम से, विहान मनुहारें करते डोले,
हर ध्वंस-लहर में जीवन लहराता है।
वंशी में क्या अब पाञ्चजन्य गाता है ?

यह व्यथा की रात का कैसा सवेरा है

यह व्यथा की रात का कैसा सवेरा है ?

ज्योति-शर से पूर्व का
रीता अभी तूणीर भी है,
कुहर-पंखों से क्षितिज
रूँधे विभा का तीर भी है,
क्यों लिया फिर श्रांत तारों ने बसेरा है ?

छंद-रचना-सी गगन की
रंगमय उमड़े नहीं घन,
विहग-सरगम में न सुन
पड़ता दिवस के यान का स्वन,
पंक-सा रथचक्र से लिपटा अँधेरा है ।

रोकती पथ में पगों को
साँस की जंजीर दुहरी,
जागरण के द्वार पर
सपने बने निस्तंद्र प्रहरी,
नयन पर सूने क्षणों का अचल घेरा है ।

दीप को अब दूँ विदा, या
आज इसमें स्नेह ढालूँ ?
दूँ बुझा, या ओट में रख
दग्ध बाती को सँभालूँ ?
किरण-पथ पर क्यों अकेला दीप मेरा है ?
यह व्यथा की रात का कैसा सवेरा है ?

आलोक पर्व-दीप माटी का हमारा

घन तिमिर में हो गया प्रहरी यही दीपक हमारा ।
हैं अमर निधियाँ तुम्हारी
दीप माटी का हमारा !

सप्त-अश्वारथ सहस्रों
रश्मियाँ जिसको मिली थीं,
और बारह रंग की
तेजसमई आकृति खिली थी,

छू सकी जिसको न आँधी
रोकता कब है प्रभंजन ?
उदयगिरि की भी शिलाएं
रोकतीं जिसका न स्यन्दन !
जग डुबाकर डूब जाता यह अमर दिनकर तुम्हारा !
दीप माटी का हमारा !

ढालती धरती इसे जब
प्राण ज्वाला में तपाती,
और कोमल फूल ही से
तूल की बाती बनाती,

स्नेह की हर बूंद सबसे
मांगकर इसमें मिलाती,
चेतना का ऋण सभी से
ले उसी से लौ जलाती,
पुत्र धरती का यही है जो कभी तम से न हारा !
दीप माटी का हमारा !

तिमिर का बन्दी हुआ है,
अब गगन चुम्बी हिमालय,
सिंधु की उत्तुंग लहरों का, हुआ अस्तित्त्व भी लय,

दिवस शिल्पी के उकेरे
चित्र अब अनगढ़ शिला है,
किंतु रवि का दाय लेने का
किसे साहस मिला है ?
नमन कर सबको चुनौती-सी ज्वलित लौ को सँवारा !
दीप माटी का हमारा !

काल की उच्छल तरंगों में
चला दीपक अकेला ।
कौन-सी तम की चुनौती
है जिसे इसने न झेला ?

दृष्टि-धन बाँटा सभी को
छंद आकृति को दिया है,
राख थी जिसकी नियति
अंगार को रसमय किया है !
है अमा का पर्व इससे दीप्त दोपहरी तुम्हारा !
दीप माटी का हमारा !

छिन्न जीवन-पृष्ठ जिन पर
अनलिखी दुख की कथाएं,
और बिखरे पृष्ठ जिन पर,
बोलती सुख की प्रथाएँ,

ज्योति-कण से बीन इसने
सब संजोये, स्वप्न खोये,
काल लहरों में उगे जो
नये जीवन-बीज बोये!
बाँच देखो बन गया यह मर्म का छान्दस् तुम्हारा!
दीप माटी का हमारा !

एक में अब जल उठे
दीपक सहस्रों शेष क्या है ?
आज लौ का मोल क्या है
तोल क्या है देश क्या है?

बाँट देगा यह सभी आलोक
जब दिन लौट आए,
क्या दिवस पथ में बिछे यह,
या किरण मे मुस्कराए
यह न माँगेगा तिमिर के सिंधु से कोई किनारा !
यह सजग प्रहरी तुम्हारा,
दीप माटी का हमारा !

रात के इस सघन अँधेरे से जूझता (गीत)

रात के इस सघन अँधेरे से जूझता
सुर्य नहीं, जूझता रहा दीपक !

कौन-सी रश्मि कब हुई कम्पित,
कौन आँधी वहाँ पहुंच पाई ?
कौन ठहरा सका उसे पल-भर,
कौन-सी फूंक कब बुझा पाई ?
ज्योतिधन सूर्य है गगन का ही,
पर तुम्हारा सृजन यही दीपक !

यत्न से वर्तिका बनाई थी
स्नेह अनुराग से अथक ढाला,
खोज अंगार जब लिया तुमसे,
तब कहीं लौवती हुई ज्वाला !
शिल्प यह प्राण का तुम्हारा है
सूर्य से लघु नहीं कभी दीपक !

देव मंदिर कुटीर चौराहा
हो जहाँ अंधतम इसे धर दो,
दीप आकाश का बना दो या
तुम समर्पित तरंग को कर दो
यह तुम्हारे अमर समर्पण की
एक पहचान-सा जला दीपक !

सिंधु में पोत पंथ पा लेंगे
हर कूटी ज्योति द्वीप-सी-होगी
राह में फिर पथिक न भूलेंगे
दृष्टि आलोक सीप-सी-होगी
तुम भले प्रात ही बुझा देना
रात में सूर्य से बड़ा दीपक !

यह तुम्हारा सृजन जला दीपक !

बंग-वंदना

बंग-भू शत वंदना ले ।
भव्य भारत की अमर कविता हमारी वंदना ले ।

अंक में झेला कठिन अभिशाप का अंगार पहला,
ज्वाल के अभिषेक से तूने किया शृंगार पहला,
तिमिर – सागरहरहराता,
संतरण कर ध्वंस आता,
तू मनाती ले हलाहल घूंट में त्यौहार पहला,
नीलकंठिनि ! सिहरता जग स्नेह कोमल-कल्पना ले ।

वेणुवन में भटकता है एक हाहाकार का स्वर,
आज छाले-से जले जो भाव-से थे सुभर पोखर,
छंद-से लघु ग्राम तेरे,
खेत लय-विश्राम तेरे,
बह चला इन पर अचानक नाश का निस्तब्ध सागर !
जो अचल वेला बने तू आज वह गति-साधना ले !

शक्ति की निधि अश्रु से क्या श्वास तेरे तोलते हैं ?
आह तेरे स्वप्न क्या कंकाल बन-बन डोलते हैं?
अस्थियों की ढेरियाँ हैं,
जम्बुकों की फेरियाँ हैं ?
‘मरण केवल मरण’ क्या संकल्प तेरे बोलते हैं ?
भेंट में तू आज अपनी शक्तियों की चेतना ले !

किरण-चर्चित, सुमन-चित्रित, खचित स्वर्णिम बालियों से
चिर हरित पट है मलिन शत-शत चिता- धूमालियों से,
गृद्ध के पर छत्र छाते,
अब उलूक विरुद सुनाते,
अर्घ्य आज कपाल देते शून्य कोटर-प्यालियों से !
मृत्यु क्रंदन गीत गाती हिचकियों की मूर्च्छना ले।

भृकुटियों की कुटिल लिपि में सरल सृजन विधान भी दे,
जननि अमर दधीचियों को अब कुलिश का दान भी दे,
निशि सघन बरसातवाली,
गगन की हर सांस काली,
शून्य धूमाकार में अब अर्चियों का प्राण भी दे!
आज रुद्राणी ! न सो निष्फल पराजय-वेदना ले !

तुंग मंदिर के कलश को धो रहा ‘रवि’ अंशुमाली,
लीण्ती आँगन विभा से वह ‘शरद’ विधु की उजाली,
दीप-लौ का लास ‘बंकिम’
पूत- धूम ‘विवेक’ अनुपम,
रज हुई निर्माल्य छू ‘चैतन्य’ की कंपन निराली,
अमृत-पुत्र पुकारते तेरे अजर आराधना ले !

बोल दे यदि आज, तेरी जय प्रलय का ज्वार बोले,
डोल जा यदि आज, तो यह दम्भ का संसार डोले,
उच्छ्वसित हो प्राण तेरा,
इस व्यथा का हो सवेरा,
एक इंगित पर तिमिर का सूत्रधार रहस्य खोले !
नाप शत अंतक सके यदि आज नूतन सर्जना ले!

भाल के इस रक्त-चन्दन में ज्वलित दिनमान जागे,
मंद्र सागर तूर्य पर तेरा अमर निर्माण जागे,
क्षितिज तमसाकार टूटे,
प्रखर जीवन-धार फूटे,
जाहनवी की ऊर्मियाँ हों तार भैरव-राग जागे !
यो विधात्री ! जागरण के गीत की शत अर्चना ले !

ज्ञान-गुरु इस देश की कविता हमारी वन्दना ले !
बंग-भू शत वंदना ले ।
स्वर्ण-भू शत वंदना ले ।

(बंगाल के अकाल पर लिखित)

अश्रु यह पानी नहीं है

अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

यह न समझो देव पूजा के सजीले उपकरण ये,
यह न मानो अमरता से माँगने आए शरण ये,
स्वाति को खोजा नहीं है औ’ न सीपी को पुकारा,
मेघ से माँगा न जल, इनको न भाया सिंधु खारा !
शुभ्र मानस से छलक आए तरल ये ज्वाल मोती,
प्राण की निधियाँ अमोलक बेचने का धन नहीं है ।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

नमन सागर को नमन विषपान की उज्ज्वल कथा को
देव-दानव पर नहीं समझे कभी मानव प्रथा को,
कब कहा इसने कि इसका गरल कोई अन्य पी ले,
अन्य का विष माँग कहता हे स्वजन तू और जी ले ।
यह स्वयं जलता रहा देने अथक आलोक सब को
मनुज की छवि देखने को मृत्यु क्या दर्पण नहीं है ।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

शंख कब फूँका शलभ ने फूल झर जाते अबोले,
मौन जलता दीप , धरती ने कभी क्या दान तोले?
खो रहे उच्छ्‌वास भी कब मर्म गाथा खोलते हैं,
साँस के दो तार ये झंकार के बिन बोलते हैं,
पढ़ सभी पाए जिसे वह वर्ण-अक्षरहीन भाषा
प्राणदानी के लिए वाणी यहाँ बंधन नहीं है ।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

किरण सुख की उतरती घिरतीं नहीं दुख की घटाएँ,
तिमिर लहराता न बिखरी इंद्रधनुषों की छटाएँ
समय ठहरा है शिला-सा क्षण कहाँ उसमें समाते,
निष्पलक लोचन जहाँ सपने कभी आते न जाते,
वह तुम्हारा स्वर्ग अब मेरे लिए परदेश ही है ।
क्या वहाँ मेरा पहुँचना आज निर्वासन नहीं है ?
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

आँसुओं के मौन में बोलो तभी मानूँ तुम्हें मैं,
खिल उठे मुस्कान में परिचय, तभी जानूँ तुम्हें मैं,
साँस में आहट मिले तब आज पहचानूँ तुम्हें मैं,
वेदना यह झेल लो तब आज सम्मानूँ तुम्हें मैं !
आज मंदिर के मुखर घड़ियाल घंटों में न बोलो
अब चुनौती है पुजारी में नमन वंदन नहीं है।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

दु:ख आया अतिथि द्वार (गीत)

दु:ख आया अतिथि द्वार
लौटा न दो ।
तुम नयन-नीर उर-पीर
लौटा न दो !

स्वप्न का क्षार ही
पुतलियों में भरा,
दृष्टि विस्तार है
आज मरु की धरा,
दु:ख लाया अमृत सिंधु में डूबकर
यह घटा स्नेह-सौगात
लौटा न दो।

प्राग अभिशप्त हो
बन गए हैं शिला
न उस पर रुका पल
न युग ही चला,
दु:ख की पगछुवन शाप की मुक्ति है
कह इसे तुम पक्षघात
लौटा न दो।

उड़ गए भाव के
हंस मोती पले,
सूखता मान-सर
सांस के तट जले
दु:ख ने शिव जटा से निचोड़ा जिसे
तुम वही पुण्य जल आज
लौटा न दो।

यह गगन नीलिमा है
सदय छांह-सी,
यह क्षितिज-रेख घेरे
सुहृद बांह-सी,
स्वर्ण जूही विपिन-सी उतरती किरण,
तुम समझकर प्रलयरात
लौटा न दो।

दु:ख आया अतिथि आज
लौटा न दो ।
तुम नयन-नीर उर-पीर
लौटा न दो !

तुम तो हारे नहीं तुम्हारा मन क्यों हारा है

तुम तो हारे नहीं तुम्हारा मन क्यों हारा है ?

कहते हैं ये शूल चरण में बिंधकर हम आए,
किन्तु चुभें अब कैसे जब सब दंशन टूट गए,
कहते हैं पाषाण रक्त के धब्बे हैं हम पर,
छाले पर धोएं कैसे जब पीछे छूट गए ?
यात्री का अनुसरण करें
इसका न सहारा है !
तुम्हारा मन क्यों हारा है ?

इसने पहिन वसंती चोला कब मधुवन देखा ?
लिपटा पग से मेघ न बिजली बन पाई पायल,
इसने नहीं निदाघ चाँदनी का जाना अंतर
ठहरी चितवन लक्ष्यबद्ध, गति थी केवल चंचल !
पहुंच गए हो जहाँ विजय ने
तुम्हें पुकारा है !
तुम्हारा मन क्यों हारा है !

न रथ-चक्र घूमे

न रथ-चक्र घूमे न पग-चाप आई
रहा शून्य मंदिर न तुम दृष्टि आए !

शिलाएँ हुईं रज घिसा नित्य चंदन,
तुम्हें खोजने को सुरभि है प्रवासी,
थके शंख का रुद्ध है कंठ भी अब
अलिन्दों भरे फूल भी हैं आज बासी!
जले दीप ने प्राण अपने बुझाए!
रहा शून्य मंदिर न तुम दृष्टि आए !

तिमिर-सिंधु में पोत-सी खो गई है
अजर वेदिका की अमिट वज्र रेखा,
अगरु-धूम ने उठ क्षितिज को मिटाया
कलश का ग्रहण बन गई भस्म लेखा !
तभी तो हमीं ने गढ़ी मूर्ति अपनी
तभी तो नए साज अपने सजाए !
रहा शून्य मंदिर न तुम दृष्टि आए !

लगाकर तिलक शुभ्र श्रम बिन्दुओं का
सजा अंग पर मृत्तिका अंग-लेपन,
बिधे शूल से और छाले संजोए,
लिए पग थके, पर लिए अनथका मन,
हमीं वेदिका पर तुम्हारी विराजे
तुम्हारे उपासक हमीं पर लुभाए !
रहा शून्य मंदिर न तुम दृष्टि आए !

न हम मुक्ति-वर की प्रथा जानते हैं
दृगों में लिए अश्रु-संजीवनी हैं,
जहाँ गिर गई बून्द धरती हरी है
नई भूमिका नव सृजन की बनी है
न जाना तुम्हें औ’ न पहचान पाए
तुम्हीं मुग्ध हो प्राण में आ समाए!
रहा शून्य मंदिर न तुम दृष्टि आए !

भले, सांस के तार दुहरे रहेंगे
लगा धूप-नैवेद्य मेला रहेगा,
मगर शंख में जय-कथा है हमारी
यही देव-विग्रह अकेला रहेगा !
हमारी सजल दृष्टि ने दीप बाले
तृम्हारी हँसी में सुमन मुस्कराए !
रहा शून्य मंदिर न तुम दृष्टि आए !

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