अग्निरेखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Agnirekha Part 2

अग्निरेखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Agnirekha Part 2

 पूछो न प्रात की बात आज-गीत

पूछो न प्रात की बात आज
आँधी की राह चलो।

जाते रवि ने फिर देखा क्या भर चितवन में ?
मुख-छबि बिंबित हुई कणों के हर दर्पण में !
दिन बनने के लिए तिमिर को
भरकर अंक जलो !

ताप बिना खण्डों का मिल पाना अनहोना,
बिना अग्नि के जुड़ा न लोहा-माटी-सोना।
ले टूटे संकल्प-स्वप्न उर-
ज्वाला में पिघलो !

तुमने लेकर तिमिर-भार क्या अपने काँधे,
तट पर बाँधी तरी, चरण तरिणी से बाँधे ?
कड़ियाँ शत-शत गलें स्वयं
अंगारों पर बिछलो।

रोम-रोम में वासन्ती तरुणाई झाँकी,
तुमने देखी नहीं मरण की वह छवि बाँकी !
तिमिर-पर्व में गलो अजर
नूतन से आज ढलो !
आज आँधी के साथ चलो !

नभ आज मनाता तिमिर-पर्व-आलोक-छंद

नभ आज मनाता तिमिर-पर्व,
धरती रचती आलोक-छंद ।

नीला सहस्रदल-अंधकार
खिल घेर रहा दिशि-चक्रवाल ।
तृण-कण को केशर-किंशुक कर
लौ की जलती निधियां संभाल,,
उड़ धूमपंख पर चले विकल
दीपक-अलियों के वृन्द-वृन्द !

लहराया सागर-सा विषाद
जीवन के तट डूबे अजान,
स्वप्नों की रत्नच्छाय तरी
तिरती लपटों के पाल तान !
ज्योति-स्पंदन से भेंट धरा
लहरों में भरती विधु-स्पंद !

हिम से आँसू-कण वेध रहे
चितवन के झीने स्वर्ण-तार,
दिन के पथ में उजले पीले
बरसे आभा के हरसिंगार,
उर के अंगारक-पाटल से
छलका यह किरणों का मरन्द ।

ज्वाला के साँचे में ढाला
भू ने अपना नवनीत प्रात ।
शत अर्चि-शिखायों में पुलकित
लेकर अपना चिर श्याम गात
बालारुण के छाया-पग से
लौटी जाती निशि मंद-मंद ।

स्वर-ताल हो गए चक्र-युगल
औ’ अक्ष बन गई लय भास्वर,
यति में है गति की रश्मि सजग
अक्षर-अक्षर के बाह अजर,
दीपक-पथ से नभ ओर चला
रज के गीतों का अग्नि-स्पंद ।

अनमिल दीपों में स्नेह एक
वर्ती शत ज्वलन-पिपास एक,
दीपों को रखता क्षार भिन्न
शलभों को करती आग एक ।
साँसों के निर्झर ने बाँधा
जड़ का ज्वाला का अमिट द्वंद्व ।

 ओ विषपाई

यह तो वह विष नहीं, मिला जो
तुम्हें क्षीर-सागर-मंथन से,
जो शीतल हो गया तुम्हारे
शीतल गंगा के जलकण से,
क्षीर सिंधु की लहरों में पल,
विधु की विमल चांदनी में मिल,
होकर गरल अमृत की जिसने
सहज सहोदरता थी पाई !
ओ विषपाई !

पान किया पर तुमने इसको
शिरा-शिरा में नहीं उतारा,
कम्बु-कंठ में अब तक है जो
नीला लांछन बना तुम्हारा !
ज्वलित नयन की चितवन में छन,
भस्म हुआ कब बना रसायन,
तुम मृत्युंजय रहे किंतु है
महा मृत्यु जिसकी परछाईं !
ओ विषपाई !

पर जीवन सागर-मंथन से
निकला है जो घोर हलाहल,
वह विष का नवनीत महाविष,
जिससे दग्ध काल के युग पल,
पलकों के सम्पुट में भरकर
कुछ आँसू की बूंद मिलाकर,
विष को अमृत किया मनुज ने
अपने लिए मृत्यु अपनाई
ओ विषपाई !

तब से दोनों साथ चल रहे
जहाँ आदि है वहीं अंत है,
रात, दिवस-किरणें बुनती हैं
पतझर ही लाता वसंत है !
फूल खिलाने पत्र झरे हैं,
रीते होने मेघ भरे हैं ।
नहीं मृत्यु पर विजय, मरण से
मानव ने नूतनता पाई !
ओ विषपाई !

रुद्र, तुम्हारा महानाश
का नर्तन तांडव
आज हमारे लिए हुआ
नवजीवन – उत्सव,
नहीं स्वप्न से आँखें रीती
स्वर्ग नहीं यह धरती जीती !
जिसमें जन्म नहीं मुस्काया
हुई पुरातन वह तरुणाई !
ओ विषपाई !

बापू को प्रणाम-पूज्य बापू को श्रद्धांजलि

हे धरा के अमर सुत ! तुझको अशेष प्रणाम !
जीवन के अजस्र प्रणाम !
मानव के अनंत प्रणाम !
दो नयन तेरे धरा के अखिल स्वप्नों के चितेरे,
तरल तारक की अमा में बन रहे शत-शत सवेरे,
पलक के युग शुक्ति-सम्पुट मुक्ति-मुक्ता से भरे ये,
सजल चितवन में अजर आदर्श के अंकुर हरे ये,
विश्व जीवन के मुकुर दो तिल हुए अभिराम !
चल क्षण के विराम ! प्रणाम !

वह प्रलय उद्दाम के हित अमिट वेला एक वाणी,
वर्णमाला मनुज के अधिकार की भू की कहानी,
साधना अक्षर अचल विश्वास ध्वनि-संचार जिसका,
मुक्त मानवता हुई है अर्थ का संसार जिसका,
जागरण का शंख-स्वन, वह स्नेह-वंशी-ग्राम !
स्वर-छांदस् विशेष ! प्रणाम !

साँस का यह तंतु है कल्याण का नि:शेष लेखा,
घेरती है सत्य के शत रूप सीधी एक रेखा,
नापते निश्वास बढ़-बढ़ लक्ष्य है अब दूर जितना,
तोलते हैं श्वास चिर संकल्प का पाथेय कितना ?
साध कण-कण की संभाले कंप एक अकाम !
नित साकार श्रेय ! प्रणाम !

कर युगल बिखरे क्षणों की एकता के पाश जैसे,
हार के हित अर्गला, तप-त्याग के अधिवास जैसे,
मृत्तिका के नाल जिन पर खिल उठा अपवर्ग-शतदल,
शक्ति की पवि-लेखनी पर भाव की कृतियां सुकोमल,
दीप-लौ-सी उँगलियां तम-भार लेतीं थाम !
नव आलोक-लेख ! प्रणाम !

स्वर्ग ही के स्वप्न का लघुखंड चिर उज्जल हृदय है,
काव्य करुणा का, धरा की कल्पना ही प्राणमय है,
ज्ञान की शत रश्मियों से विच्छुरित विद्युत छटा-सी
वेदना जग की यहाँ है स्वाति की क्षणदा घटा-सी
टेक जीवन-राग की उत्कर्ष का चिर याम !
दुख के दिव्य शिल्प ! प्रणाम !

युग चरण दिव औ’ धरा की प्रगति पथ में एक कृति है,
न्यास में यति है सृजन की, चाप अनुकूला नियति है,
अंक हैं अज-अमरता के संधि-पत्रों की कथाएँ,
मुक्त गति से जय चली, पग से बंधी जग की व्यथाएं,
यह अनंत क्षितिज हुआ इनके लिए विश्राम !
संसृति-सार्थवाह ! प्रणाम !

शेष शोणित-बिन्दु नत भू-भाल पर है दीप्त टीका,
यह शिराएँ शीर्ण रसमय का रहीं स्पंदन सभी का,
ये सृजनजीवी, वरण से मृत्यु के कैसे बनी हैं ?
चिर सजीव दधीचि ! तेरी अस्थियां संजीवनी हैं !
स्नेह की लिपियां दलित की शक्तियां उद्दाम !
इच्छाबंध मुक्त ! प्रणाम !

चीरकर भू-व्योम को प्राचीर हों तम की शिलाएँ,
अग्निशर-सी ध्वंस की लहरें जला दें पथ-दिशाएँ,
पग रहें सीमा, बनें स्वर रागिनी सूने निलय की,
शपथ धरती की तुझे औ’ आन है मानव-हृदय की,
यह विराग हुआ अमर अनुराग का परिणाम !
हे असिधार-पथिक ! प्रणाम !

शुभ्र हिम-शतदल-किरीटिनि, किरण-कोमल-कुंतला जो,
सरित-तुंग-तरंगमालिनि, मरुत-चंचल-अंचला, जो,
फेन-उज्जवल अतल सागर चरणपीठ जिसे मिला है,
आतपत्र रजत-कनक-नभ चलित रंगों से धुला है,
पा तुझे यह स्वर्ग की धात्री प्रसन्न प्रकाम !
मानव-वर ! असंख्य प्रणाम !

विदा-वेला-कवीन्द रवींद्र के महाप्रस्थान पर

यह विदा-वेला ।
अर्चना-सी आरती-सी यह विदा-वेला ।

धूलि की लघु वीण ले छू तार मृदु तृण के लचीले,
चुन सभी बिखरे कथा-कण हास-भीने अश्रु-गीले,
गीत मधु के राग धन के, युग विरह के, क्षण मिलन के,
गा लिए जिसने सभी स्वर नमित भू, उन्नत गगन के,
साथ जिसकी उँगलियों के सृजन-पारावार खेला,
आज अभिनव लयवती उसकी विदा-वेला ।
अमर वेला ।

पंख पर आरोह के, चिर सत्य के उपहार घूमें,
पुलिन पा अवरोह के, रस-रूप-रंग के ज्वार झूमें ।
शरद-स्मिति-सी दूध धोइ, अतल मधु जल में भिगोई,
आँसुयों के कुंद वन-सी रागिनी पल-भर न सोई ।
कंठ में जिसके हुआ है हर चिरंतन स्वर नवेला ।
यह उसी की मूर्च्छना-शिंजित विदा-वेला ।
अमर वेला ।

तप बना आकाश विस्तृत साधना सुख का सवेरा,
सांध्य-रंगों से भरा अनुराग था सबका बसेरा,
गीत में जयघोष भी था हास में आलोक भी था,
शक्ति-झंझा में बसा नवनीत हिम का लोक भी था !
वह चली करुणा-सरित ले साथ अपने तड़ित्-वेला !
वीण-नंदित, शंख-वंदित यह विदा-वेला ।
अमर वेला ।

धीर वट की दी न नीप अशोक मन-विश्राम की दी,
ज्वाल में उसने हमें नित छाँह प्रेमिल प्राण की दी !
छबि धरा की ले नयन में भर व्यया के छंद मन में,
बाँध आकुल विश्व का संदेश सब प्रस्थान-क्षण में,
मृत्यु के चिर श्याम अंचल में चला करने उजेला ।
यह उसी आलोक-वाही की विदा-वेला ।
अमर वेला ।

वह चला जिसके पगों ने शूल फूल बना समेटे,
वह चला जिसके दृगों ने सत्य कर-कर स्वप्न भेंटे,
पुलक से सब क्षण बसाए सांस से कण-कण मिलाए,
अमर अंकुर साध के चिर प्यास के मरु में उगाए,
अंक जिसके रह गए बन दीपकों का एक मेला !
आज दीपाली हुई उसकी विदा-वेला ।
अमर वेला ।

जो क्षितिज के पार पहुंच, ओ विहग ! वह लय मिलाओ,
भर दिशाएँ शून्य छलकाकर सुमन ! साँसें लुटाओ,
दीन अब चातक न बोले वात घायल-सी न डोले,
बढ़ अलक्षित तीर छू ले धीर सागर आज हौले,
अब चला गायक धरा का हंस अमर पथ में अकेला।
ध्वनित अंतिम चाप से उसकी विदा-वेला ।
अमर वेला ।

सौंप दी वह वीण उसने रिक्त कर ली आज झोली,
सब लुटाकर सिद्धियां पुलकित करों से नाव खोली,
मत कहो निस्पंद तम है, यह अमर तट चिर अगम है,
प्राण में संकल्प उसकी भृकुटियों पर दीप्त श्रम है ।
बंधनों की चाह से वह मुक्ति-पथ में भी दुकेला,
अजर वरदानी अतिथि की यह विदा-वेला ।
अमर वेला ।

जग उठे मधुमास बन पतझार सब जिसके सहारे,
आज क्या प्रतिदान में देंगे उसे दो बून्द खारे ?
कलश जीवन स्नेह जल हो हर नयन शतदल कमल हो,
‘पंथ शुभ’ निश्वास औ’ सांसें कहें ‘चिर मिलन पल हो’ ।
भेंट में उसको हृदय विश्वास का संसार दे ला !
स्वर्ग-भू की संधि-सी है यह विदा-वेला ।
अमर वेला ।

स्वर-निमंत्रित हम चले कब सुन कथा का शेष पाया,
चाप से आहूत पहचाने न पथ का अंत आया,
स्वस्ति जीवन के पुजारी ! स्वस्ति सत्-चित्-पंथ चारी !
स्वस्ति लय जो बन चुकी है आज उर-कंपन हमारी !
स्वस्ति यह सुधि पा जिसे हमने विरह का भार झेला !
यह तुम्हारे हास से रंजित विदा-वेला !
यह हमारे अश्रु से सिंचित विदा-वेला ।
अमर वेला ।

वेदना यह प्राण छंदस की सजल अक्षय कला है

वेदना यह प्राण छंदस की सजल अक्षय कला है ।

सीपियां अनगिन रहीं
कल्पांत तक मुख मौन खोले
स्वातियों ने तप किया
शत चातकों के कंठ बोले !
पर पता पाया न इसका,
भार झिल पाया न इसका,
अश्रु-मोती काल की निस्सीम सीपी में ढला है ।

युग-युगों होता रहा
चिर विश्व मन का गरल-मंथन
हर लहर पर तैरता आया चला यह कसककर कण,
पर न पहचाना किसी ने
गरल ही माना सभी ने
यह अमृत का घूंट विष के सात सागर में पला है ।

नाप आया साँस का विस्तार
सपने तौल आया
सत्य था अनमोल उसको
आज यह बिनमोल लाया
शीश पर चिर सजल घन है
चरण तल अंगार-वन है
किंतु दुख-पंथी हदय से आँख तक केवल चला है ।

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