अकेला- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

अकेला- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

 

घर को छोड़कर जाने वाले को मिलती
विशालता विश्व की;
पीछे अकेले छूटने वाले को
निगलती शून्यता घर की।

मिलन में उरयोग आनन्द में
लगा ही नहीं कभी, कि जुदाई थी
या होगी कभी,
हुआ पल भर का मिलन स्वप्नवत् ।

सरकते युग के-से पल
लगते सब सिर्फ खाली,
हृदय में जड़ा पल नन्हा-सा
स्मृति से भरा-भरा

पल में स्मृति के मैं जीता समूचा युग,
युग जैसे युग को पलट देता पल में।

रूपान्तर : ज्योत्स्ना मिलन

 

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