अंधे चानणु ता थीऐ-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

अंधे चानणु ता थीऐ-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥
बंधन तोड़ै सचि वसै अगिआनु अधेरा जाइ ॥
सभु किछु देखै तिसै का जिनि कीआ तनु साजि ॥
नानक सरणि करतार की करता राखै लाज ॥2॥551॥

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