अंतिम आलोक-इत्यलम् अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

अंतिम आलोक-इत्यलम् अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

सन्ध्या की किरण-परी ने
उठ अरुण पंख दो खोले
कम्पित-कर गिरि-शिखरों के
उर-छिपे रहस्य टटोले ।

देखी उस अरुण किरण ने
कुल पर्वत-माला श्यामल—
बस एक शृंग पर हिम का
था कम्पित कंचन झलमल ।

प्राणों में हाय पुरानी
क्यों कसक जग उठी सहसा?
वेदना-व्योम से मानो—
खोया-सा स्मृति-घन बरसा!

तेरी उस अन्त-घड़ी में
तेरी आँखों में, जीवन!
ऐसा ही चमक उठा था
तेरा अन्तिम आँसू-कन!

अक्टूबर, 1934

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