अंतरि हरि गुरू धिआइदा-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

अंतरि हरि गुरू धिआइदा-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

अंतरि हरि गुरू धिआइदा वडी वडिआई ॥
तुसि दिती पूरै सतिगुरू घटै नाही इकु तिलु किसै दी घटाई ॥
सचु साहिबु सतिगुरू कै वलि है तां झखि झखि मरै सभ लोकाई ॥
निंदका के मुह काले करे हरि करतै आपि वधाई ॥
जिउ जिउ निंदक निंद करहि तिउ तिउ नित नित चड़ै सवाई ॥
जन नानक हरि आराधिआ तिनि पैरी आणि सभ पाई ॥1॥307॥

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