अँचरा भिजबै जल-धार-बरसि पिया के देस-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

अँचरा भिजबै जल-धार-बरसि पिया के देस-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

 

अँचरा भिजबै जल-धार, सखी री! तन-मन जारै बीजुरी।
मेरौ तन-मन जारै बीजुरी।।

ताकि-ताकि मारै अनंग सर, सो-
अबला ह्वै, हौं कब लौं सहौं।
इत-उत, झर-झर पै झर लगै,
तिल-तिल करि हौं कौलौं दहौं।।
अब जनि भाबै सिंगार सखी! कजराई काया ईंगुरी।।
मेरौ तन-मन जारै बीजुरी।।

दिअना बरि-बरि बुझि जाय,
सखी! अँसुवनि अँगना जमुना कियौ।
घिरि-घिरि घुमड़ैं, गरजैं मिटे-
बरजैं बदरा लरजैं हियौ।।
झलमल झलकै गल-हार, सखी! मोहि भई द्वारिका देहरी।।
मेरौ तन-मन जारै बीजुरी।।

खटकी साँकर, हौं जानि कैं-
पी की आवनि, हुलसूँ जबै-
उठिकैं चलती, बिरियाँ मुई,
खोलै पर आँधी छ्वै तबै-
महकै बेला की डार, उड़ै, उड़ि केस दुखासें आँखड़ी।।
मेरौ तन-मन जारै बीजुरी।।

आकाशवाणी दिल्ली से प्रसारित

 

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