बूते की बात-काम के कलाम-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

बूते की बात-काम के कलाम-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, चाहिए आँखें खुली रखना सदा। दुख सकेंगे टल नहीं आँखें ढके। सूख जाते हैं बिपद को देख जब। किस तरह से सूख तब आँसू सके। जाँयगे पेच पाच पड़ ढीले। छेद देगा कुढंग बरछी ले। खोज कर के नये नये हीले। आँख से आँख लड़ भले ही ले। देख कर के ही किसी ने क्या किया। साँसतें…

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सजीवन जड़ी-काम के कलाम-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

सजीवन जड़ी-काम के कलाम-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, दुख बने वह अजब नशा जिस में। मौत का रूप रंग ही भावे। जाति-हित के लिए मरें हँसते। आह निकले न, दम निकल जावे। काम लेते जो विचारों से रहे। हाथ वे बेसमझियों के कब बिके। जो छिंके जी की कचाई से नहीं। छेंकने से छेंक के वे कब छिंके। हौसलेवाले हिचकते ही नहीं। राह चाहे ठीक या…

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चेतावनी-काम के कलाम-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

चेतावनी-काम के कलाम-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, पिस रहा है आज हिन्दूपन बहुत। हिन्दुओं में हैं बुरी रुचियाँ जगीं। ऐ सपूतो, तुम सपूती मत तजो। हैं तुम्हारी ओर ही आँखें लगीं। हो गया है क्या, समझ पड़ता नहीं। हिन्दुओ, ऐसी नहीं देखी कहीं। खोल कर के खोलने वाले थके। है तुमारी आँख खुलती ही नहीं। हिन्दुओ, जैसी तुम्हारी है बनी। बेबसी ऐसी बनी किस की सगी।…

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क्या थे क्या हो गये-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

क्या थे क्या हो गये-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, भोर-तारे जो बने थे तेज खो। आज वे हैं तेज उन का खो रहे। माँद उन की जोत जगती हो गई। चाँद जैसे जगमगाती जो रहे। पालने वाले नहीं अब वे रहे। इस लिए अब हम पनप पलते नहीं। डालियाँ जिनकी फलों से थीं लदी। पेड़ वे अब फूलते फलते नहीं। धूल उन की है उड़ाई जा…

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क्या थे क्या हो गये-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

क्या थे क्या हो गये-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, भोर-तारे जो बने थे तेज खो। आज वे हैं तेज उन का खो रहे। माँद उन की जोत जगती हो गई। चाँद जैसे जगमगाती जो रहे। पालने वाले नहीं अब वे रहे। इस लिए अब हम पनप पलते नहीं। डालियाँ जिनकी फलों से थीं लदी। पेड़ वे अब फूलते फलते नहीं। धूल उन की है उड़ाई जा…

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क्या से क्या-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

क्या से क्या-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, धूल में धाक मिल गई सारी। रह गये रोब दाब के न पते। अब कहाँ दबदबा हमारा है। आज हैं बात बात में दबते। आज दिन धूल है बरसती वहाँ। हुन बरसता रहा जहाँ सब दिन। तन रतन से सजे रहे जिन के। बेतरह आज वे गये तन बिन। आज बेढंग बन गये हैं वे। ढंग जिन में भरे…

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कचट-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

कचट-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, क्या न हित-बेलि लहलही होगी। क्या सकेगा न चैन चित में थम। हो सकेंगे न क्या भले दिन फल। क्या सकेंगे न फूल फल अब हम। साँसतें क्या इसी तरह होंगी। जायगा सुख न क्या कभी भोगा। क्या दुखी दिन बदिन बनेंगे ही। क्या कुदिन अब सुदिन नहीं होगा। क्या बचाये न बच सकेगा कुछ। क्या चला जायगा हमारा सब। क्या…

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ललक-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

ललक-हित-गुटके-चुभते चौपदे -अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, बीत पाते नहीं दुखों के दिन। कब तलक दुख सहें कुढ़ें काँखें। देखने के लिए सुखों के दिन। है हमारी तरस रहीं आँखें। सुख-झलक ही देख लेने के लिए। आज दिन हैं रात-दिन रहते खड़े। बात हम अपने ललक की क्या कहें। डालते हैं नित पलक के पाँवड़े।

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