द्वितीय सर्ग-अकल्पनीय की कल्पना-शार्दूल-विक्रीडित-पारिजात-अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

द्वितीय सर्ग-अकल्पनीय की कल्पना-शार्दूल-विक्रीडित-पारिजात-अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध',-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, सोचे व्यापकता-विभूति प्रतिभा है पार पाती नहीं। होती है चकिता विलोक विभुता विज्ञान की विज्ञता। लोकातीत अचिन्तनीय पथ में है चूकती चेतना। कोई व्यक्ति अकल्पनीय विभु की कैसे क कल्पना॥1॥ आती है सफरी समूह-उर में क्या सिंधु की सिंधुता? क्या ज्ञाता खगवृन्द है गगन के विस्तार-व्यापार का? पाती है न पिपीलका अवनि की सर्वाङग्ता का पता। कैसे मानव तो महामहिम…

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प्रथम सर्ग -गेय गान-शार्दूल-विक्रीडित-पारिजात-अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

प्रथम सर्ग -गेय गान-शार्दूल-विक्रीडित-पारिजात-अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध',-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, आराधे भव-साधना सरल हो साधें सुधासिक्त हों। सारी भाव-विभूति भूतपति की हो सिध्दियों से भरी। पाता की अनुकूलता कलित हो धाता विधाता बने। पाके मादकता-विहीन मधुता हो मोदिता मेदिनी॥1॥ सारे मानस-भाव इन्द्रधानु-से हो मुग्धता से भ। देखे श्यामलता प्रमोद-मदिरा मेधा-मयूरी पिये। न्यारी मानवता सुधा बरस के दे मोहिनी मंजुता। भू को मेघ मनोज्ञ-मूर्ति कर दे माधुर्य-मुक्तामयी॥2॥ वसंत-तिलका तो क्यों न…

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अष्टदश सर्ग-स्वर्गारोहण-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

अष्टदश सर्ग-स्वर्गारोहण-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, शीत-काल था वाष्पमय बना व्योम था। अवनी-तल में था प्रभूत-कुहरा भरा॥ प्रकृति-वधूटी रही मलिन-वसना बनी। प्राची सकती थी न खोल मुँह मुसकुरा॥1॥ ऊषा आयी किन्तु विहँस पाई नहीं। राग-मयी हो बनी विरागमयी रही॥ विकस न पाया दिगंगना-वर-बदन भी। बात न जाने कौन गयी उससे कही॥2॥ ठण्डी-साँस समीरण भी था भर रहा। था प्रभात के वैभव पर पाला पड़ा॥…

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सप्तदश सर्ग-जन-स्थान-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

सप्तदश सर्ग-जन-स्थान-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, पहन हरित-परिधान प्रभूत-प्रफुल्ल हो। ऊँचे उठ जो रहे व्योम को चूमते॥ ऐसे बहुश:- विटप-वृन्द अवलोकते। जन-स्थान में रघुकुल-रवि थे घूमते॥1॥ थी सम्मुख कोसों तक फैली छबिमयी। विविध-तृणावलि-कुसुमावलि-लसिता-धरा॥ रंग-बिरंगी-ललित-लतिकायें तथा। जड़ी-बूटियों से था सारा-वन भरा॥2॥ दूर क्षितिज के निकट असित-घन-खंड से। विन्धयाचल के विविध-शिखर थे दीखते॥ बैठ भुवन-व्यापिनी-दिग्वधू-गोद में। प्रकृति-छटा अंकित करना थे सीखते॥3॥ हो सकता है पत्थर का…

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षोडश सर्ग-शुभ सम्वाद-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

षोडश सर्ग-शुभ सम्वाद-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, दिनकर किरणें अब न आग थीं बरसती। अब न तप्त-तावा थी बनी वसुन्धरा॥ धूप जलाती थी न ज्वाल-माला-सदृश। वातावरण न था लू-लपटों से भरा॥1॥ प्रखर-कर-निकर को समेट कर शान्त बन। दग्ध-दिशाओं के दुख को था हर रहा॥ धीरे-धीरे अस्ताचल पर पहुँच रवि। था वसुधा-अनुराग-राग से भर रहा॥2॥ वह छाया जो विटपावलि में थी छिपी। बाहर आकर बहु-व्यापक…

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पंचदश सर्ग-सुतवती सीता-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

पंचदश सर्ग-सुतवती सीता-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, परम-सरसता से प्रवाहिता सुरसरी। कल-कल रव से कलित-कीर्ति थीं गा रही॥ किसी अलौकिक-कीर्तिमान-लोकेश की। लहरें उठ थीं ललित-नृत्य दिखला रही॥1॥ अरुण-अरुणिमा उषा-रंगिणी-लालिमा॥ गगनांगण में खेल लोप हो चली थीं॥ रवि-किरणें अब थीं निज-कला दिखा रही। जो प्राची के प्रिय-पलने में पली थीं॥2॥ सरल-बालिकायें सी कलिकायें-सकल। खोल-खोल मुँह केलि दिखा खिल रही थीं॥ सरस-वायु-संचार हुए सब बेलियाँ। विलस…

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चतुर्दश सर्ग-दाम्पत्य-दिव्यता-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

चतुर्दश सर्ग-दाम्पत्य-दिव्यता-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, प्रकृति-सुन्दरी रही दिव्य-वसना बनी। कुसुमाकर द्वारा कुसुमित कान्तार था॥ मंद मंद थी रही विहँसती दिग्वधू। फूलों के मिष समुत्फुल्ल संसार था॥1॥ मलयानिल बह मंद मंद सौरभ-बितर। वसुधातल को बहु-विमुग्ध था कर रहा॥ स्फूर्तिमयी-मत्तता-विकचता-रुचिरता। प्राणि मात्र अन्तस्तल में था भर रहा॥2॥ शिशिर-शीत-शिथिलित-तन-शिरा-समूह में। समय शक्ति-संचार के लिए लग्न था॥ परिवर्तन की परम-मनोहर-प्रगति पा। तरु से तृण तक छबि-प्रवाह में…

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त्रयोदश सर्ग-जीवन-यात्रा-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

त्रयोदश सर्ग-जीवन-यात्रा-छन्द : तिलोकी-वैदेही वनवास-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh, तपस्विनी-आश्रम के लिए विदेहजा। पुण्यमयी-पावन-प्रवृत्ति की पूर्ति थीं॥ तपस्विनी-गण की आदरमय-दृष्टि में। मानवता-ममता की महती-मूर्ति थीं॥1॥ ब्रह्मचर्य-रत वाल्मीकाश्रम-छात्रा-गण। तपोभूमि-तापस, विद्यालय-विबुध-जन॥ मूर्तिमती-देवी थे उनको मानते। भक्तिभाव-सुमनाजंलि द्वारा कर यजन॥2॥ अधिक-शिथिलता गर्भभार-जनिता रही। फिर भी परहित-रता सर्वदा वे मिलीं॥ कर सेवा आश्रम-तपस्विनी-वृन्द की। वे कब नहीं प्रभात-कमलिनी सी खिलीं॥3॥ उन्हें रोकती रहती आश्रम-स्वामिनी। कह वे बातें जिन्हें उचित थीं जानती॥…

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